उत्तर वैदिक कालीन कृषि - Agriculture in Later Vedic civilization

Agriculture during Later Vedic Civilization or Upanisadic Period of India

उत्तर वैदिक कालीन कृषि

स्रोत - सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद

उत्तर वैदिक कालीन सभ्यता का विस्तार सिंधु तथा उसकी सहायक नदी के मैदान से उच्च गंगा के मैदानी क्षेत्रो तक हो गया था । इस क्षेत्र की रेतीली और दोमट मिटटी बस्तिया बसाने के लिए मददगार सावित हुई । इस काल में साहित्यों से भौगोलिक विस्तार के संकेत प्राप्त होते हैं ।

शतपथ ब्राह्मण में वर्णन मिलता है की विदेह माधव सरस्वती से चल कर जंगल को जलाते हुए सदानीरा (गण्डक) तक पहुंच गये । संभवतः यह घटना वैदिक काल के समाप्ति के आस पास घटित हुई ।

उत्तर वैदिक काल में आर्यों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था । अथर्ववेद में 6 से 12 हलों में बैल जोत कर गहरी जुताई का वर्णन मिलता है । शतपथ ब्राह्मण में खेत जोतने के विधि संस्कार का वर्णन प्राप्त होता है । अन्य स्रोतों से पता चलता है की किसान हल लिए गूलर या ख़ैर की लकड़ी का प्रयोग करते थे । साहित्यिक ग्रंथो में 700 BC के आसपास लोहे के आगमन का संकेत मिलता है क्योकि कुछ परवर्ती वैदिक ग्रंथो में एक काली गहरी धातु की चर्चा मिलती है । हल के अलावा कुदाल और हसिया के प्रयोग का वर्णन मिलता है । इस काल में दो प्रकार के फसलो के बोन का वर्णन मिलता है ।

  • कृष्टि पच्चय (खेती कर के पैदा की जाने वाली फसल)
  • अकृष्टि पच्चय (अपने आप उगने वाली फसल)

उत्तर वैदिक काल में प्रयोग होने वाले अन्न (अनाज)

उत्तर वैदिक कालीन साहित्यों में जो चावल, तिल, उड़द, ईख, और गेहू इत्यादि का वर्णन मिलता है । यजुर्वेद में चावल के पांच किस्मो का वर्णन है ।

  1. महाव्रीही
  2. शुक्लव्रीही
  3. चन्द्रव्रीही
  4. हायन
  5. आशु धान्य

इसमें महाव्रीही धान की सबसे अच्छी क़िस्म मानी जाती थी। पाण्डु राजार धिबी (प. बंगाल) से धान के जो दाने मिलते है उनकी C-14 Dating पद्धति से 1000 BC के होने के प्रमाण मिले हैं । बिहार के गया से 700 BC और अतिरंजी खेड़ा से 500 BC पूर्व के धान की खेती के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं ।

अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में पृथ्वी को माता बताते हुए उनकी प्रसंसा की गई है । इसमें पृथ्वी को औसधियों की धारा, विसम्भरा, वसुमती, जगत उनिवेसिनी, सभी संपत्ति की धारा, पुत्रो के लिए माता के सामान दूध देने वाली, आदि से सम्बोधित किया गया है । इसी ग्रन्थ में फसल काटते हुए किसान की ख़ुशी का वर्णन मिलता है ।

वैदिक साहित्यों में हल के लिए सीर, गोबर के खाद के लिए करिश, चावल के लिए व्रीही, गेहू के लिए गोधूम, धान के लिए शाली, उड़द के लिए मात्स, सरसों के लिए सरिस्यीका एवं गणना के लिए इक्छु शब्द का प्रयोग मिलता है ।

फसलो की बुवाई और कटाई का वर्णन करते हुए यजुर्वेद में बताया गया है की गेहू जाड़े में बोया जाता था और गर्मी में काटा जाता था और चावल वर्षा के दिन में बोया जाता था और वसंत में काटा जाता था । एक वर्ष में दो फसलें उगाई कटी थी । इस काल में कृषि की सिचाई के साधनो में तलाव और कुओ के साथ साथ नहरो का वर्णन मिलता है (अथर्ववेद)। अथर्ववेद में अतिवृष्टि और अनावृष्टि से फसलों की रक्षा के लिए मन्त्रों का उल्लेख है । इसके अतिरिक्त कीट पतंगो द्वारा फसलों को नुकसान पहुचे जाने का भी उल्लेख मिलता है । विभिन्न प्रकार के फलों-सब्जियों का वर्णन उत्तरवर्ती साहित्य में प्राप्त होता है ।

  • दाल - उड़द, मूंग, मंसूर
  • फल - बेल, खजूर, आम, आमला
  • सब्जी - लौकी, ककरी, सिंघाड़ा
  • तेल - तिल एवं सरसों
  • मसाला - राई, हल्दी, मिर्च

कृषि के लिए बैलो का उपयोग होता था। जो बैल कृषि में उपयोग किया जाता था उसकी बधिया कर दी जाती थी। बैलों के अतिरिक्त गाय, बकरी, गधा, भेंड़, और घोड़ा आदि प्रमुख थे। गोवध के लिए मृत्युदंड का प्रावधान प्राप्त होता था ।

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